कहीं दूर क्षितिज में जब मेरा एकाकी
निराशा से मिल रहा होता है
मृगतृष्णा बन जब ज़िंदगी छल रही होती है
और जब समय भूलभुलैया बन जाता है
तो तुम ध्रुव तारा की तरह की मिल
रही होती हो मुझमें मेरे से
कहीं मैं ज़िंदा हूँ तो तुम धड़कन हो
है रोशन दुनिया, ख़ुशनुमा है बस तुमसे
शंकर शाह
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