Wednesday, 19 February 2025

कहीं दूर क्षितिज में जब मेरा एकाकी निराशा से मिल रहा होता था

कहीं दूर क्षितिज में जब मेरा एकाकी निराशा से मिल रहा होता है मृगतृष्णा बन जब ज़िंदगी छल रही होती है और जब समय भूलभुलैया बन जाता है तो तुम ध्रुव तारा की तरह की मिल रही होती हो मुझमें मेरे से कहीं मैं ज़िंदा हूँ तो तुम धड़कन हो है रोशन दुनिया, ख़ुशनुमा है बस तुमसे शंकर शाह

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