Tuesday, 17 February 2026

सुबह ओस की बूंदों में गुजरते हुए ख्याल आया कल रात हीं तो बरसी थी धार बूंदों की, अब बूंद बचा है पत्तियों पे ... सुहाना है सफ़र चलने का और भीगने का वक़्त, वक़्त के पहियों में कहीं इतिहास बन चूका है...अब एक ख्वाहिश है आ जाओ इतिहास के पन्नो से निकल कर और भीग लेते है बूंदों की धार में, वक़्त का पत्ती बनकर फिर मै निहारूंगा तुम्हारे सतरंगी, यादो के रंगों को (शंकर शाह)

No comments:

Post a Comment