मेरी कहानी (Meri Kaahani)
Meri Kahani is a Hindi poetry and personal writing blog created to express emotions through words. On this blog, I share my written Hindi poems on personal thoughts, emotional and life experiences inspired by love, memories, loneliness, hope, and reality. Each post reflects true feelings and everyday moments that many readers can relate to. If you love Hindi poetry, emotional writing, and soulful expressions, Meri Kahani is a place where stories are felt, not just read.
Wednesday, 19 February 2025
कहीं दूर क्षितिज में जब मेरा एकाकी निराशा से मिल रहा होता था
कहीं दूर क्षितिज में जब मेरा एकाकी
निराशा से मिल रहा होता है
मृगतृष्णा बन जब ज़िंदगी छल रही होती है
और जब समय भूलभुलैया बन जाता है
तो तुम ध्रुव तारा की तरह की मिल
रही होती हो मुझमें मेरे से
कहीं मैं ज़िंदा हूँ तो तुम धड़कन हो
है रोशन दुनिया, ख़ुशनुमा है बस तुमसे
शंकर शाह
एक वादा था
कुछ लम्हों को चुन के मैंने बुना था तुम्हें……..
जैसे, किसी चित्रकार ने एक केनवास पे अपने प्यार को उतारा हो।
इंद्रधनुषि तुम हो तो मेरा प्यार भी संगीत है …
कई ज़िंदगी जिया है एक तुम्हें पाके….
जैसे एक वादा था और हक़ीक़त तुम हो …
शंकर शाह
कई पर्तों में मैंने लिखा है प्रेम
कई लम्हों को सींचा तब स्याही बनी
अनगिनत यादों को तब पन्ने
वक़्त को रोककर जब यादों
और लम्हों को मिलाया
तब कई पर्तों मैं उतरा मेरा प्रेम
और ऐसे हीन मैं कई पर्तों मैं,
मैंने लिखा मेरा प्रेम!
शंकर शाह
एक प्रेम संगीत
रात का ख़ामोश प्रहर
जब दुधिया रोशनी मैं
घोलता है यादों का चाशनी
ना जाने क्यों, सिर्फ़ तुम होती हो
मानो जैसे संगीत, तुम्हारा संग और
साँसों मैं ख़ुशबू गुनगुना रही हो
एक प्रेम संगीत !
शंकर शाह
एक साल फिर गुज़र गया!
एक साल फिर गुज़र गया
जैसे मुट्ठी बंद हाथो से रेत
पिछले साल की तरह
इस साल भी सपने मलिन रहे
और ख़्वाब अधूरे
जाने क्यो जैसे जैसे जिंदगी के साल कम हो रहे है
वैसे वैसे छटपटाहट बढ़ती जा रही है
लौटने को फिर से एक बार बचपन मैं.
मैं और मेरी ख्वाहिशे, किसी दिन ऐसे हीन खुदकुशी कर लेंगे
और दुनिया कहेगी देखो वो बड़े लोग !
शंकर शाह
Tuesday, 20 September 2016
Do Ankhen
कहीं एक खिड़की है जो खुली रहती है मेरे इन्तज़ार में... उसी के इन्तज़ार ने मुझे यायावर और मेरे सफ़र को रंगीन बना दिया है ... कभी मिले तुम्हें दो आँखें उस खिड़की पे राह तकते मेरा ...तो कह देना ...ये कुछ हसीन कैन्वस है तुम्हारे इन्तज़ार और उसके सफ़र के बीच का !
शंकर शाह
शंकर शाह
Saturday, 6 February 2016
Diwali / दिवाली
मेरी नजरे तंगी है तुम्हारे खिड़की पे और सांसो का आना जाना तुम्हारे दरवाजे होकर गुजर रही है.
मिलाओ नजर तो फिर इश्क़ कर लूँ की अभी अभी दिल के कोने में एक दिवाली की रात हुई है....
शंकर शाह
Wednesday, 28 May 2014
Sunday, 23 February 2014
Atmgyan / आत्मज्ञान
मै हूँ कई रहस्यो के कई परतो में लिपटा हुआ।
कभी खुलेगा क्या ये परत, या कोई घाव बन रिसेगा और कर देगा बीमार। या खुद हिन् पर्यास करूँगा और खोलूँगा खुद पे चडे परतो को और पा लूँगा आत्मज्ञान या कोई आयेगा और उघेरेगा करेगा सल्य चिकीत्सा और उघेरेगा एक एक परतो को।
है उम्मीद की एक दिन खुद के खोज मे, रहस्य नहीं "मै हूँगा"।
Sunday, 16 February 2014
Atma Katha
सोचता हूँ कभी लिख दू आत्म कथा फिर झूठ फरेब से उतरता है कुछ शब्द पन्नो पे। फिर कहीं खालीपन सा झूठा सा लगता है सब। सुना है कहीं, आइना सब जानता है पर मेरे और आइने के बिच कहीं तुम बैठी हो। एक सच की मै झूठा हूँ, एक कडवी सच्चाई की तुम एक टूटी पुलिया हो मेरे और झूठ के दुरिओन के बिच।
शंकर शाह
Saturday, 21 December 2013
Jugnoo / जुगनू
सुना है टेलीपेथी से कि तुम्हारी मन कि नजरे भी टकटकी लगाये रहती है दरवाजे पे..... कमाल है, मेरे मन कि नजरे भी जुगनू बन के उडते रहते है तुम्हारे करीब … अब निकलो भी घर से बिना आहट के कि प्यार के नजर में ज्वार भाटा है.…
शंकर शाह
Friday, 6 December 2013
Matlabi Rishte / मतलबी रिस्ते
मै फिर आउंगा, गिरे पत्ते और ओश कि बूंदो कि तरह, कभी किसी के चूल्हे में जलकर आ जाउंगा काम, कभी मिल जाउंगा जमीन में और खाद के साथ मिलकर फ़ोटो सिंथेसिस प्रक्रिया में खुद को पाउँगा । `मै आउंगा, रहूँगा विकल्प बनके मतलबी रिस्तो के बिच और उसको और सींचूंगा अपने होने से ताकि तुम्हारा मतलब जिन्दा रहे और उसके बिच मै ।
शंकर शाह
Monday, 18 November 2013
Friday, 8 November 2013
Monday, 21 October 2013
Chhodo Na Wo Kal Ki Batein / छोड़ो न वो तो कल की बातें थी
कभी
पुराने खतों को खोल कर मुस्कुराई तो होगी ... शब्द नहीं मिले होंगे उन खतों
में ....ना जाने क्या था, खुद उतर जाते थे पन्नो पर उछलते कूदते बुद्धे की तरह
... खोलके देखो पुराने खतों को जब रोने का दिल करे किसी कारन, सच मानो
तुम्हारे आँशु मुस्कराहट बन थिरक जायेंगे तुम्हारे होंठो पर ...छोड़ो न वो
तो कल की बातें थी !!!! पर सच है की हंसने का वजह भी वही कल है…
शंकर शाह
Wednesday, 7 August 2013
Harddisk / हार्डडिस्क
मै डरता हूँ, इंसान के खाल में, मेरा मौजूदगी क्या है, एक सवाल है ....
मुझे सिकायत नहीं लोगो से या भीड़ से ..... मेले का क्या, चींटियो के भी तो
मेले है लगते है .... पता नहीं लोगो की ऑंखें सावन भादो किसी के प्यार में
हीं क्यों होती है ... मेरे हिस्से में, ज्वार-भाटा भावनाओ का सही नहीं
....कितना अच्छा होता न अगर मेरा दिमाग RAM होता जीवनचक्र का हार्डडिस्क
नहीं ...
#शंकर शाह
Tuesday, 23 April 2013
Na Jane Kab Tak / न जाने कब तक
तुम्हारे नजरो से चुराकर रंग, मैंने रंग लिए है मैंने चेहरे अपने ….देखो! ये धोखा नहीं है, ये तो रंग है बदलते दुनिया में, मैंने सिर्फ चेहरे हिन् रंगे है, तुम्हारे मनचाहे रंगों से… न जाने कब तक, ये समझौते की जिंदगी और मुखौटे की आड़ में एक तन्हाइ....न जाने कब तक!
शंकर शाह
Monday, 15 April 2013
Swaal / सवाल
मै
सवालो के घेरे
में कैद हो के रह गया हूँ ....जब तक वह एक सवाल का जबाब खोजता हूँ तब तक उस
सवाल के मायने
बदल गए होते है.."सवाल" सवाल अगर पथ है तो जबाब भूल भुलैया..जब सब बाधाओ
को पार कर मै पहुँच जाता हूँ जवाब के करीब तो सवाल फीर से के सवाल कर बैठता
है...जानता नहीं ये सिलसिला कबतक चलता रहेगा पर सवाल जबाब नामक बिल्लीओं
के बिच में जिंदगी बन्दर बन के बैठा है…जरूरते लोगो की, मुझे उनके बिच,
मेरे जिंदगी को कन्धा दे रखा है वरना बिल्लियाँ लडती नहीं और बन्दर महान नहीं होता ।
Saturday, 13 April 2013
Rahashyamayi Dunia / रहश्यमयी दुनिया
एक रहश्यमयी दुनिया है, जहाँ कुछ दिनों से हर रोज़ पहुच जाता हूँ, कोई है जो
मिलता है अब हररोज़ मुझे, वो मेरे खामोश कविता की कल्पना नहीं है, कुछ है
तो है उसमे, जो मै सिर्फ सुनता हूँ उसे जब वो बोलती है, अच्छा लग रहा है अब
मेरे शब्द कागज़ पे सिर्फ उतरते नहीं बतियाते भी है और बिखरते है रंग बनके,
जैसे इन्द्रधनुषी सतरंग जो अब ओझल होते नहीं मेरे आँखों से,
शंकर शाह
Saturday, 2 March 2013
Nashaa / नशा
रात भर सर्द हवाओं में तुम्हे ओढ़े रहा। आंख कैमरा बन कैद करता रहा तुम्हे,
चाँद बनकर तुम भी तो इठला रही थी। अंगुलियों ने नजाने कितने गीत लिख डाले आसमान को लैटरपैड बना। सारी रात तुम गुनगुनाती रही और महकती रही सांसो
में। एक नशा सा है तुम्हे देखना हथेलियों बिच और गले लगा लेना तुम्हारे
ख्यालों को। सुबह पक्षिओ के गीत और पत्तियों पे चमकते ओश की बुँदे गवाह है
मेरे हसीं रात का। सुबह अभी भी नशे में है और में भी, फिर रात की इंतज़ार में।
शंकर शाह
Thursday, 21 February 2013
Monday, 28 January 2013
Jaroorate / जरूरते
थका, हारा हुआ एक पथिक हूँ। दसको से अपने अन्दर खुद को खोज रहा एक असफल प्रयासकर्ता। एक सफ़र है अंतहीन सफ़र, कभी लगता है मेरा मंजिल मिल गया और कभी
सफ़र दिशाहीन। थका हुआ शरीर चल रहा है जैसे की एक आम आदमी । खुद के दौड़ से परे, जब पहियों को देखता हूँ तो बस इतना
ख्याल आता है, सायद इसे बर्तन बनाने के लिए बनाया गया होगा पर जरूरते गाड़ी बन
गई।
शंकर शाह
Tuesday, 1 January 2013
Naya Panna / नया पन्ना
नया साल नया कैलेंडर और नयी तारीखें। प्रकिती और प्राकृतिक संरचना, बदलाव
के पहिओं पे टहलता हुआ बहुत आगे निकल आया है एक बेहतर और बेहतर बदलाव के
साथ। वहीँ हम चिपके हुए है एक झूठी बोझ के साथ संस्कारी बोड़े के साथ, ये
प्रमाण है हमारे आदिम होने का। जहाँ बदलाव प्राकृतिक है वही हम बदलाव के
बिच ग्लोबल वार्मिंग। एक उम्मीद कैलेंडर के बदलते पन्नो के साथ की हम
संकीर्ण संस्कारी पन्नो को उलट के एक नया पन्ना जोड़े ताकि आने वाली सदियाँ
गाली देने के बजाय वो पन्ने पलते और लिखदे नया कुछ।
शंकर शाह
Friday, 14 December 2012
Jindagi Aur Bhukh / जिंदगी और भूख
कुछ लोग जिन्दा है, दुसरो के हाथो से रोटीओं को छीन कर। कुछ लोग जिन्दा है
अपनों के हिस्से को बेचकर और कुछ सच में जिन्दा है अपने हिस्से का बांटकर।
जिन्दा रहने और जिंदगी के बिच झूलता इंसान कितना कुछ कर जाता है जो हमेशा
जरूरत के इर्दगिर्द परिक्रमा करता या तो सूरज होता है या चाँद, पर जो भी हो
जिंदगी और भूख के बिच जलता सिर्फ तो इंसानियत या उम्मीदे है।
शंकर शाह
Monday, 12 November 2012
Jindagi Jinda Rahe / जिंदगी जिन्दा रहे
कभी मिले हो एक ऐसे चेहरे से जो आइना हो खुद का। कभी मिलाये हो ऐसे नजर से
जो देखता है तो तुम्हे पर कहीं उतर जाता है खुद में खूब गहराई तक। भगवान बस
देना ताकत की अगर लैंपपोस्ट नहीं बन सका तो कोई बात नहीं पर जुगनू बन
उम्मीद को जिन्दा रखु किसी झोपड़े का और जिन्दा मै भी रहूँ ताकि आत्मा और
मेरे बिच, जिंदगी जिन्दा रहे।
(शंकर शाह)
Thursday, 8 November 2012
Mere Hisse Ka / मेरे हिस्से का
याद है की तुम कभी थी सुबह के ओश बनके मेरे
जिंदगी के पत्तियों पे। सूरज इन्द्रधनुष बन एहसास कराता था, की कुछ रंग है
मेरे जीवन में भी। वक़्त है की करवटे बदलता रहा और रात है की निहारता है
तुम्हे अब चाँद में। अब उतरो हकीकत बनके मेरे प्यार छत पे और मिलो तुम की
मेरे हिस्से का करवाचौथ अभी बाकि है।
शंकर शाह
Friday, 2 November 2012
Khap / खाप
कोई उतरता है ख्वाब बनके रोज़ रात में...और कई कहते है, ख्वाब ख्वाब हिन्
रहे तो अच्छा है...इच्छा है,कोई डाल दे जिन्दा इंसान मे जिंदगी और मेरे
अधूरे बोल संगीत बन थिद्के किसी के होंठो पर...जिंदगी अब मिल भी जाओ, वक़्त
है की ठहरता हिन् नहीं है और "खाप" वाले है की प्रेम के चौपाल पे मंदिर
बना रहे है.....
( शंकर शाह )
Saturday, 20 October 2012
Khai / खाई
कौन मिला, कहा मिला, हम तो वही खड़े है...जहाँ से सफ़र की सुरुआत थी...अजीब
उलझन है....कदमो के निशान सड़क पे है हिन् नहीं पर लगता है की थक गया
हूँ....वो कौन सा सफ़र था या सफ़र का फैसला जो बाकि है मंजिल के लिए....मै
हूँ.... हाँ सिर्फ मै हिन् तो हूँ...दूर दूर तक सिर्फ दिख रहा है तो जमीन
और आसमान के बिच की खाई....
शंकर शाह
Thursday, 11 October 2012
Monday, 24 September 2012
Wednesday, 5 September 2012
Guru / गुरु
"वक़्त" कभी माँ की तरह गोद में खेलाते बचपन को तो कभी गुरु की तरह सिखाते दुनिया...दोस्त बनकर कभी उचल कूद करलेते हुए तो कभी पापा बनकर कहते हुए लड़ो जीना है तो...कहते है न "गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागु पायें..बलिहारी गुरु आपनो गोविन्द दियो बताय"... ए वक़्त गुरु, मै एकलव्य और अर्जुन तो नहीं पर आप द्रोणाचार्य हो मेरे लिए...और आज के दिन आप को सत: सत: नमन: :)
(शंकर शाह)
Thursday, 16 August 2012
Pagal / पागल
कुछ खास तो नहीं जो मै बोलता हूँ...कुछ खास भी तो नहीं जो मै सोचता
हूँ...ऐसा कुछ भी तो खास नहीं है जो आपको यातना देता हो...फिर मुझे
"पागल", ये उपनाम क्यों?
शंकर शाह
शंकर शाह
Thursday, 19 July 2012
Jhhutha Nind / झूठा नींद
कुछ आत्माओ के आवाज़ बढ़ रहे है मेरे आत्मा में सोये इंसान को जगाने के
लिए...वो पविव्त्र आवाज़ है ऐसा नहीं कहता.. पर कुछ तो है, उस आवाज़ का
स्पर्श झंझोर्ता है मेरे अन्दर के इन्सान को...एक गहरी नींद है जो सपनो में
मुझे इंसान बनाये हुए है.. और मै जानता भी हूँ की मै नींद में हूँ...मै
सोया हुआ हूँ, एक आलस है जो कहती है की तू कर्मवीर है..पर वो आवाज़ जो
झ्न्झोर रही है जगाने के लिए ?...सपने और सच का द्वंध है.. उम्मीद है मै जग
जाऊंगा इस से पहले की झूठा नींद हमेशा के लिए न सुला दे मुझे....
(शंकर शाह)
Friday, 15 June 2012
Khamosh Sham / खामोश साम
बार बार, हर बार,
हर कोई ने ने मुझे
पढ़ने की कोशिस की
और मै खुली किताब
की तरह तुम्हारी नजरो
से दिमाग में उतरता रहा...
कुछ पन्ने मेरे कोड़े थे..
और वो तुम न जाने कब
मेरे कोड़े पन्नो में
शब्द बन
उतर गई
कभी कभी इतिहास
गलिओं में उतर जाता हूँ मै
और विज्ञानं की तरह
दिल और तुम्हारे होने के बिच
रिस्तो पे प्रयोग करने लगता हूँ मै
कभी कभी खामोश साम
की तरह तुम्हे सुनना चाहता
हूँ और संगीत की तरह
समेटना चाहता हूँ
तुम्हे अपने संग्रह में
याद का भूगोल जब तुम्हारी
मुस्कुराहट और हसीन मौसम
के बिच के दुरिओं को नापने
लगता है तो ऑंखें सावन भादो बन
बिछ जाता है तुम्हारे गलिओं में,
और याद आता है तुम्हारे
गलिओं से गुजरना,
जब भी गुजरा तुम्हारे गलिओं
से मेरे धधकन ने आवाज़ लगाये,
न जाने तुम कैसे सुन लेती
थी धडकनों को और
आ जाती थी खिड़की पे ..
तुम्हारे साथ होना एक नशा था
शायद प्रकृति
भी उस
नशे बहक जाता होगा ...
तुम्हारी हाथो से जमीन पे खिंची
लकीरे आज भी मेरे दिल में
शिलालेख
की तरह अंकित
है...
तुम्हे बोलना बहुत अच्छा लगता था
और मेरा भी जिद्द था सुनने का...
सुनने की जिद में सायद बहुत
कुछ रह गया कहने को...
आज जब यथार्त के ठोकरों से
जब अतीत के चप्पल घिसने लगे है
तब थके हुए काया में ग़ज़ल बनके
उतरने लगती हो तुम..
बहुत अच्छा लगता है घास को
बिछौना और यादो को तकिया बनाके
एक हद तक तुम्हे सुनना
और जागते हुए में कभी कभी सो जाना
तुमारी यादो की गोद में...
(शंकर शाह)
Thursday, 15 March 2012
Aukat / औकात
कल हीं किसी ने मारा था धक्का मेरे आत्मा को...वक़्त के प्यार ने मुझे उड़ना
सिखा दिया था उड़ना असमान में...और मै उड़ने लगा था बिन डोर पतंग की
तरह..बागो में फूलो की जवानी भी कितनी अजीब होती है न...भूल जाते है जिस के
लिए दीवाने है वो छनभंगुर है.. सुख और दुःख में भी इतना हीं फासला है और
सायद हंसी और उदासी में भी....उड़ते हुए पतंग में डोर हो या न हो पर
गुरुत्वाकर्षण उसकी औकात जानता है...हाँ सायद इसीलिए एक बचपन के खामोश दर्द
ने मुझे मेरे औकात बता दिए...
(शंकर शाह)
Wednesday, 15 February 2012
SimaRekha / सीमारेखा
कुछ शब्दों को जब जोड़कर कविता बनी तो ख्याल आया, ये शब्द सिर्फ शब्द नहीं
थे..जिंदगी के अनुभव थे..जिंदगी के सफ़र थे...ये वो शब्द थे जो अनकही
थे...जो कहना चाहता था तुमसे, ज़माने से..पर कंकर की तरह दिल के शीपी में वो
कैद हो कर रह गए..कुछ सीमाओ तक समेत सकता था उन्हें, और सीमाओं का भी सायद
सीमा था जो सीमारेखा तोड़ कर वो बिखरपड़े कागज़ पर ..पढने वालो ने सिर्फ कला
समझा...और मैंने तो हर बार अपने दिल को खोलने की कोशिस की, इस डर से की
कही मेरे मौन मेरे लिए शूल न बना जाये...
(शंकर शाह)
Tuesday, 31 January 2012
Monday, 30 January 2012
Anshan KabTak / अनसन कब तक
मुर्दों के शहर में कुछ घायल छटपटा रहे है जिन्दा रहने की कोशिश में....एक
जद्दोजहद एक आखिरी कोशिस है जिन्दा रहने की...कोशिश, हाँ! कोशिश, जहाँ
इंसानियत रोटी बन गया है और लालच भूख, वहां अनसन कब तक,
(शंकर शाह)
Saturday, 28 January 2012
Parloukik / परलौकिक
एक आविष्कार था जो परलौकिक शब्दार्थ में सायद इंसान रहा होगा..या सायद
मानव..भगवान का एक बेहद खुबसूरत आविष्कार ...इसीलिए सायद वो अन्तरिक्ष अनंत
से निकलकर अपने आविष्कार के दिलो में बसने लगे..मैंने भी आविष्कार किया था
अपने नींद एक सपने को और सपने से एक जिंदगी पर यथार्त का भूख हर आविष्कार
को निगल गया..वो सपना था जिसका नियम सायद सच के परिधि पर चुम्बकतव आकर्षण न
रखता हो पर मानव, इन्सान और उसके दिल में बसने वाले भगवान, उफ़ सवाल और
जबाब न जाने कब तक पृथ्वी के दो धुरी की तरह दुरी बनाये रहेंगे ...
(शंकर शाह)
Saturday, 21 January 2012
Generation Gap / जेनेरेसन गेप
वो जिंदगी भर दुनिआदारी के अनुभवों से रेत चुन ज्ञान का मोती बनाते रहे....और हम जेनेरेसन गेप कह के उनके अनुभवों को ठुकराते रहे....
(शंकर शाह)
(शंकर शाह)
Tuesday, 17 January 2012
Sanskaro Ke Hath / संस्कारो के हाथ
बहुत
कुछ मौत जैसा अटूट सत्य है लेकिन मै नकारता हूँ ...इसीलिए नहीं की मै खुद
और खुद के दायरे मे बंधक हूँ...इसीलिए मेरे सच से बाण से किसी के झूठी
भावनाओ के घर मै आग न लग जाये...सोचता हूँ ये कैसी भावना...जहा सोच के बंद
कमरे में खुद के द्वारा फैसले और सही साबित किया जाता हो.. जहाँ सच को झूठ
और झूठ को सच मानता हो ..
दुर्भाग्य जन्मभूमि का है जहाँ इतिहास के अव्सेशो के चीख को घोंटा जाता है
और नया लिखा जाता है कुछ मस्तिक पटलो में एक नए ब्रिजरोपन की तरह..पेड़
हमने बोया पर काटने वाला हम नहीं होंगे..मेरा अन्दर आत्मा चीखता है और में
संस्कारो के हाथ उसका आवाज़ घोंट डालता हूँ...तुम खुश रहो...
(शंकर शाह)
(शंकर शाह)
Sunday, 4 December 2011
DIARY / डायरी
खामोश होंठो ने बहुत बार तुमसे कुछ कहना चाहा..पर हर बार तुम्हारी झुकी
निगाहों ने बंचित रखा उसे कुछ कहने से...खामोश तुम भी रह गई...खामोश में भी
रह गया...अब जब तुम पलकों कैद से आजाद हो गई हो...तो यादें हर रोज धुन्दती
है तुम्हे...कभी सरसों के भूल में तो कभी गुलाब के सुगंध में...तुम्हारा
होने का एहसास अब मीठी यादें है और तुम्हारा न होना होंठो को तकलीफ देता
है...बहुत कहना है जो बाकि रह गया था...सायद कभी मिलो तो दिखाऊ, तुम्हारी
दी हुई गुलाब अब भी बात करता है और हररोज़ उतरता है कविता बनकर मेरे डायरी
में....
(शंकर शाह)
Monday, 7 November 2011
Wo Kayar Nahi Tha / वो कायर नहीं था
एक लाश पड़ी थी चौराहे पे
कुछ मासूम बिलख रहे थे
मैंने समझना चाहा
क्यों एक नदी, समुन्द्र
आने से पहले भटक गया,
मैं जानना चाहा क्यों
क्यों एक शरीर,
आत्मा से जीत गया,
चेहरे पे भूख की लकीर थी,
आँखों में उफ़ अजब सा दर्द था
सायद आंशु की जगह खून टपके होंगे
पैरो में पड़ा चप्पल, सुना रहा था
कहानी उसके दौड़ की,
जो किसी मैदान में दौड़ने के
निशान जैसा न था,
सायद दौड़ रहा था पेंसन के लिए,
ताकि राशन के दो दाने मिटा दे
भूख बिलखते परिवार के,
उसके बिधवा बहु के,
बिलखते उसके बच्चो के,
चेहरे पे एक तेज था,
सायद उसे उम्मीद रहा होगा,
जीतेगा वो, कोई तो पिघलेगा,
और मिल जायेगा उसे पेंसन,
उम्मीद रहा होगा सायद भगवान
पे भी, हाँ हो सकता है,
ऊपर वाला भी कुछ,
लाचारी के रात में
एक अच्छा सुबह छुपा रखा होगा,
या चलती लाशो में जान डाल देगा,
देख कर लगा वो कायर नहीं था
यूँ हिन् वो नहीं मरा होगा
पहले नोंचा गया होगा सरकारी
कौवों से, फिर बची हड्डियो को
बुद्धिजीवी कुत्तो ने नोचा होगा,
हर बलात्कार के बाद,
कुछ बची होगी जान उस शरीर में
गले की रेखा बता रही,
आखरी साँस उम्मीद से टुटा होगा,
(शंकर शाह)
कुछ मासूम बिलख रहे थे
मैंने समझना चाहा
क्यों एक नदी, समुन्द्र
आने से पहले भटक गया,
मैं जानना चाहा क्यों
क्यों एक शरीर,
आत्मा से जीत गया,
चेहरे पे भूख की लकीर थी,
आँखों में उफ़ अजब सा दर्द था
सायद आंशु की जगह खून टपके होंगे
पैरो में पड़ा चप्पल, सुना रहा था
कहानी उसके दौड़ की,
जो किसी मैदान में दौड़ने के
निशान जैसा न था,
सायद दौड़ रहा था पेंसन के लिए,
ताकि राशन के दो दाने मिटा दे
भूख बिलखते परिवार के,
उसके बिधवा बहु के,
बिलखते उसके बच्चो के,
चेहरे पे एक तेज था,
सायद उसे उम्मीद रहा होगा,
जीतेगा वो, कोई तो पिघलेगा,
और मिल जायेगा उसे पेंसन,
उम्मीद रहा होगा सायद भगवान
पे भी, हाँ हो सकता है,
ऊपर वाला भी कुछ,
लाचारी के रात में
एक अच्छा सुबह छुपा रखा होगा,
या चलती लाशो में जान डाल देगा,
देख कर लगा वो कायर नहीं था
यूँ हिन् वो नहीं मरा होगा
पहले नोंचा गया होगा सरकारी
कौवों से, फिर बची हड्डियो को
बुद्धिजीवी कुत्तो ने नोचा होगा,
हर बलात्कार के बाद,
कुछ बची होगी जान उस शरीर में
गले की रेखा बता रही,
आखरी साँस उम्मीद से टुटा होगा,
(शंकर शाह)
Monday, 24 October 2011
Happy Diwali / दिवाली मुबारक
आज सुबह के धुप में आने वाले कल के लिए हजारो दीपक जगमगा रहे है आँखों
में...उम्मीद से रौशनी और आज को समर्पित हम कल के लिए पटाखे है...दिवाली के
लिए हम राम तो नहीं जो लोटेंगे घर...हम एक सफ़र बनके निकलेंगे जो रामराज्य
ला सके..एक प्रण और दृढ़ता के साथ दिवाली हम सब को मुबारक हो....
(शंकर शाह)
(शंकर शाह)
Saturday, 15 October 2011
Kayro Ke Basti / कायरो के बस्ती
कायरो के बस्ती
में एक भीड़ देखा
नोच रहे है गिद्धों की
तरह अपने आत्मा को
और विचार आइने में
खूबसूरती धुंध रहे है
बहुत कुछ है करना चाहिए
पर कुछ हिन् बस में है
की जो वो कर सकते है
जो की दुसरे की आंच पे
अपना रोटी सेंकना है
कौन कहता है यहाँ
राजनीति सिर्फ नेता करते है
इस गाँव के हर चेहरे पे
लोमरी मुखौटा लगा बैठा है
कायरता को बटुआ बना
पीछे के जेब में दबा रखा है
नोच रहे है खुद को
जानते है ये
पर बहानो के कवच से
खुद को बचाए रखा है
धुप में पैर सेंकते
हिन् नहीं ये बंधू
और कहते है आज
चांदनी में आग है
(शंकर शाह)
में एक भीड़ देखा
नोच रहे है गिद्धों की
तरह अपने आत्मा को
और विचार आइने में
खूबसूरती धुंध रहे है
बहुत कुछ है करना चाहिए
पर कुछ हिन् बस में है
की जो वो कर सकते है
जो की दुसरे की आंच पे
अपना रोटी सेंकना है
कौन कहता है यहाँ
राजनीति सिर्फ नेता करते है
इस गाँव के हर चेहरे पे
लोमरी मुखौटा लगा बैठा है
कायरता को बटुआ बना
पीछे के जेब में दबा रखा है
नोच रहे है खुद को
जानते है ये
पर बहानो के कवच से
खुद को बचाए रखा है
धुप में पैर सेंकते
हिन् नहीं ये बंधू
और कहते है आज
चांदनी में आग है
(शंकर शाह)
Tuesday, 4 October 2011
Nam Ankho Se / नम आँखों से
कुछ पल दिमाग के कैद से निकल के...फ़ैल जाते है आँखों के अंतरिक्ष में...कभी
ये अन्तरिक्ष के आकाशगंगा से कैद हुए तारे है ...पर अब ये मस्तिक के किसी
पेटी में कैद हो गए है...अब जब भी खोलता हूँ बंद पेटी और देखता हूँ
इन्हें..नम आँखों से एक मुस्कान होता है होंठो पर
(शंकर शाह)
Saturday, 24 September 2011
Na Jane Kyo / न जाने क्यों ?
एक लाश तंगी थी
चौराहे के नीम से
रस्सी उसे समेत ,
रही थी खुद में
जैसे कृष्ण सुदामा
का मिलन हो रहा था,
न जाने क्यों
कृष्ण इतना इतना
दीवाना हो रहा था
न जाने क्यों
सत: आंखे अश्रुविहीन थे
और कुछ आंखे
क्यों हुआ सोच रहा था
हाँ ! सवाल तो था
इस बार पानी अच्छी हुई थी
सुखा का मार न पड़ा था
कर्जे के बिज से, इस बार
फसल अच्छा हुआ था,
कोई बीमारी भी तो न थी उसे
और सरकार के आँकरो से
वो गरीब भी तो न था,
क्योंकी पचास से ज्यादा तो
उसके अम्मा के दवा में जाता था,
हाँ बिटिया भी तो
व्याह लायक हो रही थी
शायद सेल्समेन सा
दौड़ता दौड़ता थक गया था ,
नहीं! अभी कैसे थक
सकता था वो
अभी अभी हीं तो
उसके बच्चे का शहर
के स्कूल में
दाखिला हुआ था,
कल सुना था मैंने उसे
अगले साल का फसल
कर्जे के आधे दामो में
बिका था,
सरकार ने तो !
लगाई थी दुकान
फीर न जाने क्यों
वो नेताजी के
हाँ सवाल तो था
न जाने क्यों ?
(शंकर शाह)
चौराहे के नीम से
रस्सी उसे समेत ,
रही थी खुद में
जैसे कृष्ण सुदामा
का मिलन हो रहा था,
न जाने क्यों
कृष्ण इतना इतना
दीवाना हो रहा था
न जाने क्यों
सत: आंखे अश्रुविहीन थे
और कुछ आंखे
क्यों हुआ सोच रहा था
हाँ ! सवाल तो था
इस बार पानी अच्छी हुई थी
सुखा का मार न पड़ा था
कर्जे के बिज से, इस बार
फसल अच्छा हुआ था,
कोई बीमारी भी तो न थी उसे
और सरकार के आँकरो से
वो गरीब भी तो न था,
क्योंकी पचास से ज्यादा तो
उसके अम्मा के दवा में जाता था,
हाँ बिटिया भी तो
व्याह लायक हो रही थी
शायद सेल्समेन सा
दौड़ता दौड़ता थक गया था ,
नहीं! अभी कैसे थक
सकता था वो
अभी अभी हीं तो
उसके बच्चे का शहर
के स्कूल में
दाखिला हुआ था,
कल सुना था मैंने उसे
अगले साल का फसल
कर्जे के आधे दामो में
बिका था,
सरकार ने तो !
लगाई थी दुकान
फीर न जाने क्यों
वो नेताजी के
भतीजे को फसल बेचा !
हाँ सवाल तो था
न जाने क्यों ?
(शंकर शाह)
Tuesday, 20 September 2011
TimTimate Tare / टिमटिमाते तारे
लडखडाते कदम से ख्वाहिसों के तितली कभी आंगन के उड़ा करती थी...अभिलाषा के पैर पंख लगा के उरते थे, नन्ही सी हथेली में इन्द्रधनुषी रंग को कैद करने...उचल कूद के साथ कभी कई सपने किसी आँखों के गर्भ में पलते थे.. टिमटिमाते तारे अंधियार सपनो में लालटेन होता था किसी का...में जागता हूँ अभी नींद से डरकर...जब से देखा है मेरे प्रतिरूप में, तितलिओं के पीछे भागते कदम से मेरे बच्चे का...
(शंकर शाह)
Friday, 16 September 2011
अन्ना आन्दोलन
अन्ना आन्दोलन के खिलाफ बोलने वालो से निवेदन: १. आप अगर ज्ञानी है तो, आपने समाज बदलाव में कितना योगदान दिया है?
२. अगर आपके पास विकल्प है आन्दोलन का तो, अभी तक कहा सो रहे थे?
३. अगर सो नहीं रहे थे और प्रयास कर रहे थे बदलाव का तो, फेसबुक और ब्लॉगर के गलियो से निकल कर पंचायत के चौबारे तक क्यों नहीं आये?
४, अगर व्यवशाय,नाम कमाने की कोशिस कर रहे तो, इतना याद रखिये जिंदगी जी रहे है.पर आपका जिंदगी आने वाली पीढ़ी पर बोझ और गाली की तरह होगी ?
हर सिक्के के दो पहलु होते है.जरूरी ये है वो सिक्का काम का हो
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