Saturday, 30 April 2011

जैसे किसी भी जन्म का प्रमाणपत्र मरण उसी तरह हमारे पतन के पीछे हमारा अज्ञानरूपी ज्ञान छुपा हुआ है...हम बुद्धिजीविता के ढोंग में खुद के लालच को दुसरे पे थोपते है...एक नम्र निवेदन " अगर आप ज्ञानी है तो ज्ञान का सद्य्प्योग उपयोग कीजिये...आजीवन ज्ञान को प्राप्त करना और ज्ञान को बांटना दो आदमियो का काम है १. शीक्क्षक  २. बेकार

(शंकर शाह)

Saturday, 23 April 2011

Bazaar / बाज़ार


बाज़ार में मेरा भी एक दुकान था...बोली भी लग रहे थे और में बेचने के लिए मैंने विचारो को रख दिया...बाज़ार है!भावनाओ का वहां क्या जरूरत...जैसा खरीरदार वैसा विचार...पर कुछ ऐसे मौके आये जब खरीददार के जगह पे विक्रेता मिले..जो जीवन के भूख में कामधेनु थे...मैंने सोचा कुछ लेलु उनसे ताकि संस्कार के फेहरे में कुछ ताजगी भर पाउ...पर जितनी बार दिल के जेब खोला, देखा तो खाली था!!!

(शंकर शाह)

Friday, 15 April 2011

बहुत दिनों के बाद सोचा चलो आज देखे दिन से रात का मिलन...जो कभी हमारे दिनचर्या का हिस्सा हुआ करता था...साथियों के साथ खेल का एक हिस्सा हुआ करता था वो अब परीक्षा के पल की तरह थकाने लगा है...जाने और नजाने कई फसलो को तय करने के बाद महसूस होता है की...लौटना चाहिए नीले चादर के निचे घासों से छुपनछुपाई खेलने... उन हंसो को अपना बनाने का फिर से मन करता है जो थके हारे घर लौटते वक़्त हमसे बतिया लिया करते थे...पंडित जी के चेहरे बदल गए है पर अब भी वहां बच्चो मेला लग जाता है...सोचता हूँ फिर से हम उस मेले में सामिल हो ले...

(शंकर शाह)